देखता हुँ बैठे हुए मेरे इस “ह्रदय” में-
मेरे “जीवन” का सारा “संचालन”तुम ही तो करते ।
“हे” “मेरे” “गुरुवर”कभी लगवा अपने शान्ति सागर में मुझे गोते,
कभी अशान्त तुफानों में अकेले मुझेछौड़ देते हो।
“व्याकुलता” से भरी सुन पुकार मेरी तुमफिर रह भी कहां पाते हो,
“प्रेम” अपना “लुटा” कोई एक नई”तालिम” दे मुझे “उल्हास” से फिर तुम भर देते हो।
कभी बना मुझे “संतोष” धन का “बादशाह” फिर कभी थमा हाथ में कटोरा “भीखाँरयो” वाला “असंतोश” की कठोर “गर्म हवाओं” में “झु्लँजा” बुरी तरह देते हो।
ऐसी हालात में मुझे ज्यादा देर तुम फिर देख भी कहां पाते हो,छुपा अपने “आचँल” में लगवा के अपने “प्रेम-सागर” के “शीतल गोते””रुहे जिस्म” तक “नहला” देते हो।
कठिन -कठिन “परिस्थितियों” में भी कर “बैपरँवा” कभी-कभार छोटी सी “मुश्किल” में भी “परेशान” मुझे कर देते हो।
ऐसे कर के अपना मेरे साथ होने का “हर-पल” “हर-छन” “सदैव” मुझे “अहसास” करवा तुम देते हो।
मुझे बतला की यह “कर्मो” का “सफर” तेरा ही है रे लक्ष्मण,मेरे “ह्रदय” में सदा रहने का “वादा” कर।
मेरा हर “दर्द” “हर्ष” में बदल मेरी हर “महोरम” को “दिवाली” में बदल तुम ही तो देते हो।
“गुरुवर” कृपा, “गुरुवर” इच्छा ही केवलम्